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जंगल कटे खुलेआम, वन विभाग का आराम? मजबूरी या मिलीभगत का खेल!

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बोड़ला ब्लॉक के वनांचल क्षेत्र राजाढार से बोक्करखार मार्ग पर सराई के इमारती वृक्षों का जो हाल है, उसे देखकर ऐसा लगता है जैसे कटाई की बाकायदा “सरकारी अनुमति” मिल चुकी हो। एक वृक्ष को साफ गिरा दिया गया है और आसपास खड़े लगभग पंद्रह पेड़ों को नीचे से चारों ओर गोलाई में काटकर अधमरा छोड़ दिया गया है—ताकि वे धीरे-धीरे सूख जाएं और फिर आराम से धराशायी कर दिए जाएं।

यह कोई जंगल की गहराई का मामला नहीं, बल्कि मुख्य मार्ग से सटा खुला दृश्य है। राहगीरों को दिख रहा है, ग्रामीणों को दिख रहा है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि बिट गार्ड, डिप्टी रेंजर और रेंजर को शायद यह नजारा दिखाई नहीं दे रहा। सवाल उठता है—क्या निगरानी तंत्र सो रहा है या फिर सब कुछ “इशारों” पर चल रहा है?
पेड़ों को इस तरह गोल काटकर सुखाने की तरकीब कोई अनजान नहीं अपनाता, यह सुनियोजित तरीका है। ऐसे में विभाग की खामोशी और भी सवाल खड़े करती है। क्या यह मजबूरी है, लापरवाही है या फिर मौन स्वीकृति?
जंगल बचाने का जिम्मा जिनके कंधों पर है, उन्हीं की आंखों के सामने जंगल हल्का होता जा रहा है। अब देखना यह है कि कुल्हाड़ी तेज है या कानून?

मुकेश अवस्थी

प्रधान संपादक

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