कागजों में शिक्षा, जमीन पर ताला! बोड़ला ब्लॉक के वानंचल के स्कूलों की बदहाल तस्वीर।

बोड़ला
सरकारें भले ही “पढ़ेगा इंडिया, तो बढ़ेगा इंडिया” का नारा बुलंद करते न थकती हों, लेकिन कबीरधाम जिले के वनांचल और अंतिम छोर के गांवों में यह नारा दोपहर होते-होते दम तोड़ देता है। विकासखंड बोड़ला के सुदूर ग्राम धनवाही और सुखझर के प्राथमिक विद्यालयों में मंगलवार को जो नजारा दिखा, उसने शिक्षा विभाग के दावों की पोल खोलकर रख दी। यहां दोपहर के अभी ठीक से 2 भी नहीं बजे थे कि स्कूलों के मुख्य द्वारों पर बड़े-बड़े ताले लटकते पाए गए। बच्चे पढ़ाई करने की उम्र में स्कूल के बाहर खड़े होकर सिस्टम की बेरुखी का तमाशा देखते नजर आए।

जब इस ‘समय पूर्व तालाबंदी’ का राज जानने की कोशिश की गई, तो जो जवाब मिला वह शिक्षा विभाग की लचर और संवेदनहीन नीतियों पर सबसे बड़ा तंज है। ग्राम धनवाही प्राथमिक शाला के प्रधानपाठक से जब पूछा गया कि देश के भविष्य को दोपहर 2 बजे ही क्यों घर भेज दिया गया? तो उन्होंने लाचारी भरा अजीबोगरीब तर्क दिया। प्रधानपाठक महोदय ने कहा— “मैं स्कूल में अकेला शिक्षक हूँ। दलदली में संकुल स्तरीय बैठक थी, वहां जाना भी जरूरी था। अब बताइए, मैं स्कूल सँभालु या बैठक
उच्च अधिकारियों के आदेश भी नजर आए फीके, बयानों में विरोधाभास
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला मोड़ तब आया, जब विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) भानु प्रताप चंद्राकर से इस विषय पर चर्चा की गई। बीईओ चंद्राकर ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “हमारे तरफ से साफ तौर पर निर्देशित किया गया है कि किसी भी शिक्षक को स्कूल बंद करके किसी भी बैठक में नहीं जाना है। इसके बावजूद अगर ऐसा हुआ है, तो मैं संबंधित समन्वयक (सीएसी) और शिक्षक से जानकारी लेता हूँ।”
बीईओ साहब का यह बयान साफ करता है कि शिक्षा विभाग में उच्च अधिकारियों के आदेशों की क्या हैसियत है! अधिकारियों के कड़े निर्देश निचले स्तर पर आते-आते कितने फीके और बेअसर हो जाते हैं, यह इस घटना से साफ समझा जा सकता है। एक तरफ अधिकारी कह रहे हैं कि स्कूल बंद नहीं करना है, तो दूसरी तरफ संकुल स्तर पर ऐसी बैठकें रख दी जाती हैं कि एकल शिक्षक वाले स्कूल को ताला लगाने पर मजबूर होना पड़ता है। आखिर समन्वय की कमी और इस लचर व्यवस्था की सजा ये मासूम बच्चे कब तक भुगतेंगे?
साहबों की हाजिरी जरूरी, बच्चों की पढ़ाई ‘ऑप्शनल’!
कबीरधाम के इन सुदूर अंचलों में एकल शिक्षक (एक ही शिक्षक के भरोसे पूरा स्कूल) की बीमारी सालों पुरानी है। जब भी कोई शासकीय कार्य, चुनाव ड्यूटी या संकुल बैठक होती है, तो पूरा का पूरा स्कूल ही ‘ऑफिशियल’ तौर पर बंद कर दिया जाता है। अधिकारियों के कागजी दावे और मैदानी हकीकत के बीच की यह खाई बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेल रही है।
ग्रामीणों में भारी आक्रोश, वैकल्पिक व्यवस्था की मांग
स्कूलों में समय से पहले ताला लटके देख स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों का गुस्सा फूट पड़ा। ग्रामीणों ने कड़े शब्दों में शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि अधिकारियों को बैठकें ही लेनी हैं, तो वे इसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं करते?
ग्रामीणों ने जिला शिक्षा अधिकारी से मामले की सुध लेने की मांग की है। अब देखना यह होगा कि बीईओ भानु प्रताप चंद्राकर की इस ‘जानकारी’ और ‘जांच’ के बाद व्यवस्था में कोई सुधार होता है, या उच्च अधिकारियों के आदेश इसी तरह फीके पड़ते रहेंगे और वनांचल के इन मासूमों का भविष्य साहबों की बैठकों की भेंट चढ़ता रहेगा।



