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79वें उर्स में उमड़ा जनसैलाब, लेकिन “अपने” नेताओं की गैरमौजूदगी बनी चर्चा का विषय

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रीवा। शहर के घोघर तकिया मोहल्ले में हज़रत मकबूल शाह रहमतुल्ला अलैह एवं हज़रत खाकी शाह रहमतुल्ला अलैह का 79वां सालाना उर्स इस बार केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि इसने शहर की राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी। हजारों की भीड़, सूफियाना कव्वालियां और समाज की एकजुटता के बीच सबसे ज्यादा चर्चा उन नेताओं की रही, जिन्हें मुस्लिम समाज वर्षों से अपना मानता आया है, लेकिन वे आयोजन में नजर नहीं आए।


21 मई से शुरू हुए उर्स में फातिहाखानी, लंगरखानी और अन्य धार्मिक रस्मों का आयोजन किया गया। 23 मई की रात आयोजित मुख्य कव्वाली कार्यक्रम में मुंबई से आए मशहूर कव्वाल आरिफ नाज़ा और आवेश जाहिद नाज़ा ने अपनी सूफियाना प्रस्तुति से पूरी रात समां बांधे रखा। रात 9 बजे से शुरू हुई महफिल देर रात तक चलती रही और बड़ी संख्या में लोग कार्यक्रम स्थल पर डटे रहे।
पूरे आयोजन की जिम्मेदारी उर्स कमेटी तकिया घोघर ने संभाली। कमेटी अध्यक्ष अब्दुल शहीद मिस्त्री सहित हाजी रफीक निजामी, मो. सुल्तान, नीमू खान, पप्पू भाई, साबिर ठेकेदार, हसीन खान, वसीम अब्बासी, मुन्ना भाई और सईद भाई ने व्यवस्थाओं को संभालते हुए मेहमानों की मेहमाननवाजी की।


हालांकि इस बार धार्मिक आयोजन से ज्यादा चर्चा राजनीतिक अनुपस्थिति को लेकर रही। कार्यक्रम में कांग्रेस जिला अध्यक्ष राजेंद्र शर्मा, सेमरिया विधायक अभय मिश्रा, रीवा महापौर अजय मिश्रा बाबा और कांग्रेस नेता गुरुमीत सिंह मंगू सरदार को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। प्रचार-प्रसार में इनके पोस्टर और बैनर भी लगाए गए थे, लेकिन कार्यक्रम में इन नेताओं की गैरमौजूदगी लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई।
स्थानीय लोगों का कहना था कि चुनाव के समय समाज के बीच पहुंचने वाले नेता सामाजिक और धार्मिक आयोजनों से दूरी क्यों बना लेते हैं। कई लोगों ने इसे मुस्लिम समाज की राजनीतिक उपेक्षा के रूप में भी देखा।
दूसरी ओर भाजपा नेता एवं समाजसेवी वालेन्द्र शुक्ला की मौजूदगी ने पूरे कार्यक्रम का राजनीतिक माहौल बदल दिया। मंच से समाज को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वे हर वर्ग के साथ खड़े रहे हैं और आगे भी किसी भी परिस्थिति में समाज का साथ निभाएंगे। उन्होंने कहा कि वे राजनीति नहीं, रिश्ते निभाने आए हैं।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार कांग्रेस नेताओं की गैरमौजूदगी और भाजपा नेता की सक्रिय उपस्थिति ने मुस्लिम समाज के भीतर नई राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया है। वर्षों से चले आ रहे वोट बैंक की राजनीति के बीच अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या समाज केवल चुनावी समय की नजदीकियों को स्वीकार करेगा या फिर उन चेहरों को प्राथमिकता देगा जो सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में भी साथ दिखाई दें।
79वां सालाना उर्स जहां धार्मिक आस्था, सूफियाना परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक बना, वहीं इसने रीवा की राजनीति में “हाजिरी बनाम रिश्तेदारी” की नई बहस भी छोड़ दी।

मुकेश अवस्थी

प्रधान संपादक

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