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असली मुद्दा महिला आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन है” — इंजी. योगेश्वर चन्द्राकर

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यह जो प्रस्ताव सामने लाया गया है, उसे महिला आरक्षण बिल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक गंभीर है। असली मुद्दा महिला आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन (Delimitation) है, जो भारतीय संविधान और संघीय ढांचे पर सीधा प्रभाव डाल सकता है।
आरोप है कि प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया के माध्यम से संसद में तमिलनाडु, दक्षिणी राज्यों और पूर्वोत्तर क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व को कम करने की कोशिश की जा रही है। यह न केवल क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ सकता है, बल्कि देश की विविधता और संघीय संरचना को भी कमजोर कर सकता है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने संसद में इस प्रयास का विरोध करते हुए इसे रोकने का दावा किया है, और इसे भारत की मूल अवधारणा पर हमला बताया है। इंडिया गठबंधन का कहना है कि वह तमिलनाडु सहित सभी राज्यों की पहचान, अधिकार और प्रतिनिधित्व की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
इस प्रस्ताव को लेकर यह भी कहा जा रहा है कि:
यह वास्तव में महिलाओं के सशक्तिकरण से जुड़ा नहीं है
यह OBC, SC और ST समुदायों के हितों के खिलाफ हो सकता है
यह छोटे और क्षेत्रीय रूप से महत्वपूर्ण राज्यों के अधिकारों को कमजोर कर सकता है
विपक्ष का मानना है कि इतने बड़े और दूरगामी बदलाव को जल्दबाजी में लागू करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है। इस तरह के संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक चर्चा और सहमति आवश्यक है।
अंततः, यह केवल एक विधेयक नहीं, बल्कि देश की संरचना, प्रतिनिधित्व और एकता से जुड़ा विषय है। इसलिए इसकी हर पहलू से गंभीरता से समीक्षा जरूरी है, ताकि भारत की विविधता, संतुलन और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की जा सके।

मुकेश अवस्थी

प्रधान संपादक

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